Relieve me of Rhyme
Dear God,
Relieve me of rhyme
Let not anything — be anything else anymore
Let me just be — and see and unsee
Let me not be all flesh anymore.
I wish to live.
31st March
At times the most permanent thing in the world has seemed to me the chirping of birds.
I've wished often I were a tree
A bird would nest in me
And sing out its life
And I would listen
And I would care
I would hear the sound of the universe.

To the Daughter of Gaṅgā
Sweet Daughter of Gaṅgā,
You are the World.
I hear, and see, and smell, and touch
And taste every bit of you,
All the time, and everywhere.
Ocean of oceans, I swim in you,
You are the Dream of dreams.
You are the Life of lives.
You are Sex itself.

For all the golden-most rivers I’ve seen,
All suns in sparkling waters,
All deep, dark woods, and mists of steam
Fragrant of jasmine and frangipani,
And rose, and lemon, and all lush teas,
Sweeping, a-swirling, ‘cross powdery shores
Of sands, and snow as smooth and soft,
And delicious as pillows of cream;
All fires within and fires without,
Of all holiest hues the heavens have been,
Purples, and pinks, and crimsons, and blues,
Floating liquid beneath the ground;
The twinkling stars arrayed above
To light, delight, mysterious night;
And during the day, the sugar and fruit
And honey, and oil and spice,
Thickly and richly dripping along
Towards sublime oblivion,
Where every echoing chant I’ve heard,
And every song of bird and beast
In every trunk of tree embraced,
In winds that moan from dusk to dawn
Through valleys brimming with wonderous tale
And incense heavy and hot and hard,
Swelling and swelling till all becomes
The mountains highest in all the world,
The glooms and glories of rarer airs there
Where senses a-spire to zeniths reach,
Where diamonds and rubies, brilliant, compete
With newborn leaves bedewed and sweet,
Whereupon the peaks, they trembling melt
To puddles of gentlest, pliable clay,
In every which pond a pebble is dropped.
And Ages release their pent-up passion.
The ripples expand to waves so vast,
Upturn the when and where of fact.
Sinuous, co-sinuous, tangential forms,
Abstractions engirdling the timeless space
Undulate free and far and wide
Reflecting casements painted bright
Of domes of pleasure round and round-
Bubbles flashing visions immortal.
The traceries tighten- and wits return
To meadows of wildest magic,
And heaths of every billowing grass,
And forests wet with rain.
Fertile, full of invisible bloom,
Molten folds of lava guard
Measureless caverns, chasms unearthed
Seething with fountains of youth.
And from that point,
From within the undergrowth,
The infinite rolling, voluptuous roads
To Worlds yet still untravelled.

It is you, it is all you, Siren Queen.
The poetry of Earth is you.
The chariot is ready, the signs have been.
The skies beckon to you.

Come with me.

वैष्णव जन तो
२१ अप्रैल
इस तरजुमे पर बीमारी की हालत में काम किया गया। घर में बन्द, बुख़ार और साँस की दिक्क़त के बीच, सर में दर्द चलते, अचानक, मालूम नहीं कैसे, 'वैष्णव जन तो' की याद आ गई। पाकिस्तानी एक गायक की आवाज़ में सुबह सुना वह भजन- कई बार सुना- और हर बार, आँसू रुक नहीं पाए। कुछ पाँच-सौ साल पुराने कवि नरसिंह मेहता के हाथों गुजराती में लिखे इस गीत को इस तरह पहले कभी महसूस नहीं कर पाया। गुरू महात्मा गान्धीजी की मनपसन्द कविताओं में से थी यह। संलग्न, अनुवाद पेश करने की कोशिश।
'वैष्णव जन' आप
उन्हें कहें, जो
परायों की पीड़ा
जानते हों।
दुखियों पर
उपकार करें जो,
मन में अभिमान न
आने दें।

समस्त संसार की
वन्दना करें जो,
निन्दा करें न
किसी की;
वचन, काय, मन
स्थिर रखें,
धन्य है जननी

सभी को एक नज़र से देखें,
लालच त्यागें,
हर स्त्री को अपनी माता-सा मान दें।
जीभ कभी
असत्य न बोले जिनकी,
पराए धन पर कभी
हाथ न पड़ें।

घेरे नहीं जिन्हें,
वैराग्य दृढ़
रहे मन में।
राम-नाम में
लीनता लगे,
सारे तीर्थ खुद के
तन में रहें।

लोभ और
कपट से रहित रहें,
से बचे रहें।
'नरसैया' पुकारते है इन्हें,
दर्शन करता है इनकी।
एकोत्तर जो कुल को पार पहुँचाएँ।
Vaiṣṇav Jan To
19th April
The adjoining was been written in a state of illness. Quarantined at home, tackling fever and difficulty in breathing, and with rather a painful ache in the head, all of a sudden, I was reminded of 'Vaiṣṇav Jan To'. A Pākistānī singer I listened to in the morning- many times over- not once was I able to restrain my tears. Written some five hundred years ago, by poet Narasiṃh Mehatā in Gujarātī, I was never before able to appreciate the hymn as I was doing. My insides, as though, were filled with peace. The song was a favourite of spiritual father, Mahātmā Gāndhī as well. An attempt at a translation.
Call them the 'Vaiṣṇav'
Who do know another's suffering,
Who do help the sorrowful,
But are never proud,

Who worship the entire world,
And no one demean;
Who in speech, action, and thought be ever stable,
Blessed be the mother of such ones.

As equals do they see all, renounced have they greed,
Every woman do they respect as their mother.
Never does their tongue speak untruths,
Never do they lay hands on another's wealth,

Attachment and illusion whom cannot engulf,
Detachment, for whom, remains ever firm;
They lose themselves in the name of 'Rām',
And every pilgrimage find within.

They covet now, nor cunning are they,
Protected are they from desire and anger.
'Narsaiyā' calls out to them, and bows before them,
They who so liberate their entire lineage.
I dip into the Gaṅgā of my Mind
19th April
-Breath in-
I dip into the Gaṅgā of my mind,
And sink;
And all is thanked, and all forgiven.
The fever ceases.

-Breath in-
Neither night it is outside, nor day.
I do not dream anymore.

-Breath out-
A slave on my own land,
I hear 'Svarāj' being chanted.

आख़िर क्यों रहते रहना चाहता हूँ मैं इस हमारे देश में
११, २० अगस्त
तारीख़ आज ११ अगस्त है, २०२०। अब से कुछ ही दिनों में अपना 'स्वतन्त्रा' दिवस मनाएँगे हम सभी। १९४७ से आज तक ७३ साल पूरे होने को आएँगे, और सिन्धु घाटी से आज तक कुछ ५३००। हाल ही में मैंने कहीं पढ़ा था कि जहाँ तक रहन-सहन का सवाल है, हिन्दुस्तान दुनिया के सबसे 'कम अच्छे' देशों की गिनती में आता है। फिर भी, मैं क्यों रहते रहना चाहता हूँ यहाँ, यह दोस्त अकसर मेरे से पूछते हैं।

निम्नलिखित से पहले यह बता देना सही होगा शायद कि अपने जीवन में मैंने पर्याप्त ऐश्वर्य अनुभव किया है, इतना, कि पर्याप्त मेहनत-मशक़्क़त के बाद, अपनी मौजूदा स्थिति सँभाल रहा हूँ, पर इतना भी, दरअसल, कि कुछ और मेहनत-मशक़्क़त के बाद, अपनी मौजूदा स्थिति से नजात भी पा सकता हूँ, अगर चाहूँ। यह सच हैं कि बचपन के मेरे कई जान-पहचानवाले यह नजात चुन चुके हैं- देश छोड़ चुके हैं मेरा मतलब है। यह भी सच है कि मैंने खुद एक दफ़ा यह देश छोड़ दिया था- शारीरिक तौर पर भी, वापस न आने का मंसूबा बाँधे, और मानसिक तौर पर भी- पर यह भी सच है कि आज वापस ही लौटा हुआ पाता हूँ अपने आप को।

रहना यहाँ मुझे पसन्द नहीं। झूठ नहीं कह सकूँगा। अगर रोज़ाना नहीं अब, कम-से-कम एक बार हफ़ते में जी-भर के गालियाँ सुनाता हूँ देश को। यहाँ के लोगों के बारे में भी दरअसल कुछ अच्छा नहीं है मेरे पास कहने को; कोशिश बहुत कर चुका हूँ, पर वे और मैं एक क़िस्म के बिल्कुल नहीं। विलायतों से आते हैं मेरे दोस्त बीच-बीच में, और हल्का भी पाता हूँ ऐसे मिलनों के बाद अपने आप को कुछ, पर एक बहुत गहरा अफ़सोस-सा भी महसूस करता हूँ हर बार, जब यह एहसास होता है कि उनमें से किसी की भी यह दिली ख़्वाहिश नहीं हो सकती कभी, कि वे भी यहाँ रहें किसी दिन, घर बसाएँ अपना यहाँ- जब यह एहसास होता है बल्कि कि जो कोई भी रह रहें हैं यहाँ पहले से, वे भी अपनी खुद की इच्छा से नहीं ऐसा कर रहे- मौक़ा मिलते ही कब फुर्र हो जाएँ, किसी को पता भी न चले। जले पर नमक छिड़कने जैसा होगा, पर यह भी मानना पड़ा है कि दरअसल कुदरतन खूबसूरती जैसी भी कोई चीज़ नहीं यहाँ, कम-से-कम यहाँ दिल्ली में, जिसके सहारे दिल बहलाया जा सके।

हालाँकि अपने मौजूदा ख़यालात की क़सम नहीं खाना चाहूँगा- फ़लसफ़ों और हरकतों में सामञ्जस्य हालाँकि, हाँ, बनाए रखने की हमेशा नसीहत देता हूँ, ज़िन्दगी-भर के रूढ़िवाद का कभी मैंने समर्थन नहीं करा- इन ख़यालात का बखान ज़रूर करना चाहूँगा। और यह भी जितने कम शब्दों में कर सकूँ, क्योंकि असलियत में तो ग्रन्थ पर ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं ऐसे किसी भी विषय पर।

ख़ैर, उपरोक्त को मध्य नज़र रखते, भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। जिस तरह जङ्गलों के नियम अपना लिए जा चुके मालूम होते हैं हमारे देश में, हमारे 'आधुनिक' 'इण्डिआ' में, राजनीतियों के एवज़ में, मेरा ख़याल है आने वाले सालों में एक बहुत ही घटिया नक़ल-सी बनकर रह जाएँगे हम अमरीका के। और मुझे लगता नहीं कि ऐसे दिन को मैं किसी भी प्रकार की उत्सुकता से देखना चाहूँगा।

भूत के बारे में अगर बात करें- मेरे खुद के भूत के- तो जब पहली बार, पूरे होश-ओ-हवास के साथ, मैंने 'हिन्दुस्तानी बनने' का फ़ैसला लिया (जिस दौरान, ग़ौर करें, इङ्ग्लैण्ड में रह रहा था मैं), कारण मेरे कुछ इस तरह रहे थे: एक प्रकार की दिल को चोट, आर्थिक मुश्किलें, अपनी खुद की ज़बान सुन पाने की बढ़ती मनोकामना, वीज़्अ-सम्बन्धित अन्यायों के प्रति बढ़ता गुस्सा, और 'आत्मसम्मान' का पुनर्जागरण, जिसके होते, उन रईसियों की और तारीफ़ें नहीं कर पा रहा था मैं, जो मुझे मालूम था मेरे खुद के देशवासियों से लूटी गई थी कभी। न पाखण्डी, न ही भगोड़े, के रूप में देखने चाह रहा था अपने आप को और। अपने खुद के देश के सुधार के बारे में ज़रूर ही कुछ कर सकता था, ऐसा सोचने लगा। मालूम होते हुए भी अगर नहीं कर रहा था ऐसा, तो धिक्कार था मेरे जीवन पर। बेशक लोग वहाँ के यहाँ से ज़्यादा विनम्र रहे मेरे साथ, बेशक वहाँ की आब-ओ-हवा ज़्यादा ताज़ा महसूस हुई, बेशक वहाँ के देहात, सचमुच 'देहात' नाम के योग्य मालूम हुए, अगर रहता रहता वहाँ, खोखला महसूस करता अपने आप को। महात्मा गान्धी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लेखनों में डुबा दिया अपने आप को मैंने, और अपने देश को नई नज़रों से देखा। ऐसा लगने लगा, मानो कुछ मतलब होता है हमारे पैदाइश-स्थलों का।

तब से आज तक, दुर्भाग्यवश, कई ऐसी ग़लतफ़हमियाँ दूर करनी पड़ी हैं। वह गान्धी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का भारत कहीं नहीं दिखा मुझे। 'प्रयोगात्मक' तौर पर, या 'साङ्ख्यिक' तौर पर, कुछ हासिल नहीं कर पाया हूँ बल्कि और। आज भी यहाँ के लोगों से ज़्यादा अपने विदेशी जान-पहचानवालों के बल पर चलता है मेरा काम-काज। भाषा और पोशाक को लेकर मेरे सभी प्रयोग पूरी तरह असफल रहे हैं। मैंने सुना है कहीं कि 'लिखा है जहाँ कञ्चन भी बरसता हो, लेकिन अगर कोई अपमान करता हो, नहीं बुलाया हो, तो उस घर में प्रवेश नहीं करना!'। बतौर ज़ाती नीति, अब उन्ही देशों की तरफ़ क़दम बढ़ पाते हैं, जहाँ या तो मुझे आमन्त्रित किया गया हो, या जहाँ मेरे आना किसी को नापसन्द नहीं हो, जिन देशों की गिनती बहुत कम मालूम होती है। प्रदूषण रुकने का नाम नहीं ले रहा, न ही जनसङ्ख्या। और जीवन खुद इतना सस्ता हो चुका प्रतीत होता है हमारे इस देश में, कभी-कभार यक़ीन नहीं होता। सभी सरकारों में, फिर चाहे वे राष्ट्रों की हों, या खुद 'भगवान्' की, मुझे अब कोई विश्वास नहीं रहा।

विश्वास बचा है तो, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के शब्दों में, दुनिया के उन विशेष व्यक्तियों में ही जो सोच ठीक से पाते हैं, महसूस इज़्ज़तदार ढङ्ग से कर पाते हैं, और कर्म कर्त्तव्य-बद्ध कर पाते हैं, नैतिक सत्य के उन विशेष स्रोतों में। न पाखण्डी, न ही भगोड़ा, समझता हूँ अपने आप को आज भी; न ही उस 'आत्मसम्मान' को छोड़ फेंका है अभी तक, जो कई करोड़ों और फेंक चुके हैं। शायद यही काफ़ी साबित हो रहा हो, मेरे यहाँ रहते रहने के चाहने में? हाँ, हमेशा नहीं याद रहता यह सब- गर्मियों के दिनों में मसलन, दोपहर की जलती धूप में, 'ट्रैफ़िक जैमों' में फँसे, पर मौलिक सिद्धान्त के रूप में रहता है सदा यह सामने। भविष्य के बारे में- उस भविष्य के बारे में जिसका जीता-जागता हिस्सा नहीं हों शायद- हाँ इतना ज़रूर कहा जा सकता है: कि एक विश्वास मालूम होता है मुझे- भले ही मेरी खुद की कल्पना में ही- ज्योति-रूपी- कि अगर रहते-भर रहूँ इस हमारे हिन्दुस्तान में, भले ही कभी कुछ न कर सकूँ इसके विकास के लिए, और सभी दिक्क़तों के बावजूद, और उस सारी जानकारी के बावजूद भी कि कैसे और भी रहा जा सकता है दुनिया में- स्कैण्डिनेइविअ जैसे भूखण्डों में जैसे- जहाँ अगर किसी भी आम आदमी से अपनी जीवनशैली का बस एक लफ़्ज़ में बखान करने को कहा जाए, तो 'आरामदायक' शब्द का इस्तेमाल सुनने को मिले शायद, जिस जगह हमारे खुद का देशवासी 'कामचलाऊ' बोल उठे- अपना किरदार कम-से-कम जीवन में निभा रहा होंगा। और असल में तो ऐसा भी नहीं कि हर एक इंसान ही छोड़ भागना चाहता है देश को। आज भी, निःसन्देह, करती हैं भ्रमण महात्माएँ इसकी धरती की।

'प्रयोगात्मक' तौर पर दोबारा, हाँ, कई और प्रेरणाएँ भी इकट्ठी करनी पड़ी हैं। 'आख़िर क्यों रहते रहना चाहता हूँ मैं इस हमारे देश में', आहिस्ता-आहिस्ता 'आख़िर कैसे रहते रहना चाह सकता हूँ मैं इस हमारे देश में' में तबदील हुआ मालूम होता है। असल बात तो यह है कि अगर ज़्यादा सोचा नहीं जाए उसके बारे में कभी, बस जितना अच्छे से बन सके रहते रहा जाता रहे, किसी भी जगह रहा जा सकते है, नहीं? पर हाँ, यहाँ, दिल को कठोर बनाना पड़ा है, इसमें कोई शक नहीं। आदर्शों के साथ भी करना पड़ा है समझौता। यह समझना पड़ा है कि किसी के भी साथ न ही ज़्यादा घुला-मिला जा सकता है हमेशा, न ही दुश्मनी रखी जा सकती है। वह 'सब कुछ या कुछ नहीं' के सिद्धान्त को भी छोड़ना पड़ा है, जहाँ तक अपने खुद के व्यक्तित्व का सवाल उठता है; चुनना-बीनना आना सीखना पड़ा है। काव्य से, बदक़िस्मती से, अपने आप को दूर रखना पड़ा है। जीवन के किसी भी और पहलु से मेल नहीं खाता दिखने लगा था वह। दुनिया-भर में जो वह 'आज और अभी' पर ध्यान करने का चलन चल पड़ा है, उसके भी विरोध जाना सीखना पड़ा है- वर्तमान के बारे में ज़्यादा नहीं सोचने के ज़रिए- या यह कहूँ बहुत ही सूझ-बूझ के साथ सोचने के ज़रिए; वर्तमान की बजाय भूत में गर्व महसूस करना, और भविष्य के बारे में जितना भी सामरिकवाद बन सके, उसके सहारे सोचना, यह सीखना पड़ा है। भविष्य के बारे में बल्कि, मैं देख रहा हूँ अब, ऐसा नहीं कि कुछ नहीं कहा जा सकता। मुक़ाम हासिल करने हैं कई अपने जीवन में मुझे, मक़सद पूरे करने हैं कई। इनमें से कई जितनी आसानी से यहाँ कर सकूँगा, शायद ही बाहर कर पाऊँ, चोर-उचक्कों की तरह, किसी तरह, वहाँ की नागरिकता छीन। मेरा ख़याल है चर्चा यहाँ आ थमती है हमारी, फ़ैसला इस चीज़ पर निर्भर करता है, कि आख़िर किस हद तक इंसान जा सकता है अपनी उस ज्योति को जलाए रखने के लिए, इससे पहले की वे मौजूदा-वर्तमानकालिक-'सहूलियतें' मुँह मोड़ दें उसका हमेशा के लिए। अगर फिर भी कोई ज़ोर डाले मेरे खुद पर, कि मैं उस 'क्यों' का जवाब दूँ उसे, 'क्यों रहते रहना चाहता हूँ मैं इस हमारे देश में', तो वह यह दूँगा फ़िलहाल कि क्योंकि मेरा घर है यहाँ, मेरे खुद का घर- जिसे अपने हिसाब से सजा-सँवार सकता हूँ, जिसमें अपने हिसाब से उठ-बैठ सकता हूँ, जिसके लिए, मेरा मतलब है, किराया नहीं देना पड़ता मुझे किसी को। इतना 'चालाक' नहीं शायद, इतना 'व्यापारी' नहीं अभी तक, कि ऐसी किसी भी स्थिति को कहीं और उत्पन्न कर सकूँ, बिना जीवन के एक बहुत ही अहम हिस्सा को न्योछावर कर। अभी के लिए, कम-से-कम मेरा खुद का घर मेरा ही है, जहाँ किन्ही और पराए-अनजाने नियमों का नहीं पालन करना पड़ता मुझे। क्या 'नियन्त्रण' की इच्छा पर आ ख़त्म होती है बात? अगर पूछा जाए मेरे से कभी, कि अगर कुत्ता होता, तो सड़क पर रहना पसन्द करता है या किसी का पालतू बन, मेरा जवाब एक दम 'सड़क' सुनाई पड़ता सभी को, 'पालतू' क़तई नहीं।


अपने परिवार के इतिहास का भी सङ्कलन करना चाह रहा हूँ कुछ समय से। कल, १९ अगस्त को, इसी ताल्लुक़ में एक बात सूझी: कि मेरे खुद के पूर्वज भी क्या, उपरोक्त तर्क की बुनियाद पर, 'भगोड़े' नहीं कहलाए जाने चाहिए? क्योंकि देश-देश में ही सही, पलायन तो उन्होने भी कई बार करा। मगर ग़लत होगा मेरा ख़याल है, ऐसा करना, नहीं? पलायन की भी दो वज़हें हो सकती हैं क्योंकि: ज़रूरत, और इच्छा- जहाँ 'इच्छा' से तात्पर्य मेरा एक प्रकार की 'खुददारी' से है, फिर चाहे वह इस रूप में हो कि 'क्योंकि वहाँ, कहीं और, मेरे गुणों की तारीफ़ यहाँ से ज़्यादा होगी', या हूँ कहें, 'वहाँ पैसे ज़्यादा मिलेंगे मुझे उनकी नुमाइश के बदले', या फिर उल्टा भी, 'जहाँ पैसे की ताक़त मेरी कई दसियों-गुना बढ़ी हुई मालूम होगी, बिना मेरे किसी भी तरह की मेहनत के'। जहाँ तक मुझे खुद को पता है, पूर्वजों ने मेरे वह दूसरा 'इच्छापूर्वक' पलायन कभी नही करा। ऐसा कहने के ज़रिए मैं यह नहीं व्यक्त करना चाहता कि जो लोग ऐसा करते हैं, वे अपराधी माने जाने चाहिए, अगर पलायन उस तरह का हो जिस तरह का इटली से स्पेन जैसे देशों के बीच किया जा सकता है, पर मुझे लगता नहीं की 'सहूलियत' को तब तक, मेरे से पहले, पूजनीय देवी घोषित किया जा चुका था। मेरे पूर्वजों ने ज़रूर पलायन करें हों, कई बार, बार-बार, पर ऐसी जगह कभी नहीं जहाँ बेइज़्ज़ती का सामना करना पड़ा हो उन्हें, ऐसी जगह कभी नहीं जहाँ जा पाने भर के लिए दरख़्वास्त करनी पड़ी हो किसी से उनको।

मेरा ख़याल है कुछ-कुछ ये मेरे ख़यालात शादी-ब्याह के से लगते हैं। बेशक ज़ाती तजुर्बा नहीं हो ऐसे मज़मून का मुझे, पर किसी और देश चले जाना, कम-से-कम आज के देन, कुछ-कुछ व्यभिचार-सा महसूस होता है। और बदक़िस्मती से इतना बेसब्र भी नहीं मैं कि तेज़-रफ़्तार तलाक़ पसन्द करूँ।

यही सवाल बल्कि, मुझे हाल ही में पता चला, लेखक खुशवन्त सिंह से भी एक बार पूछा गया था। आपको उनके भी जवाब में दिलचस्पी हो शायद। '"हिन्दुस्तानी क्यों हूँ मैं?" मेरे पास कोई चारा ही नहीं; मेरा जन्म हिन्दुस्तान में हुआ था। भगवान् अगर मेरे से पूछ लेने की मेहरबानी कर लेते एक बार, तो हो सकता है कोई और देश चुन लिया होता मैंने- कोई और अमीर देश हमारे से, जहाँ भीड़ नहीं होती इतनी, न ही रोक-टोक इतनी, ज़ाती रिश्तों की परवाह नहीं करते जहाँ इतनी लोग, और धार्मिक कट्टरता भी नहीं देखनी पड़ती हर जगह। पर क्या गर्व है मुझे, अपने हिन्दुस्तानी होने पर? मुझे खेद है इस सवाल का जवाब नहीं दे पाऊँगा शायद। अपने पुरखों की सफलताओं का श्रेय मैं तो नहीं ले सकता। न ही आज जो कुछ भी हो रहा है यहाँ, उस पर कुछ भी गर्व करने वाली बात है। तो, मेरा ख़याल है, "नहीं", मुझे कहने पड़ेगा। "नहीं, नहीं है मुझे गर्व अपने हिन्दुस्तानी होने पर"। "कई और क्यों नहीं चले जाते आप फिर? कई और क्यों नहीं बस जाते?" एक बार फिर, चारा नहीं है मेरे पास कोई। जिस किसी भी देश में असल में जाना चाहूँगा, आप्रवासियों के लिए दुर्भाग्यवश बहुत ही कम कोटा होता है; जिसके अलावा ज़्यादातर प्रवासी वहाँ के गोरे मालूम होंगे, 'रङ्गीन' लोगों के प्रति जिनके मन में भेद मालूम होगा। और वैसे भी, यहाँ हिन्दुस्तान में ज़्यादा पाबन्दरहित महसूस कर पाता हूँ, ज़्यादा गृहस्थ। कई सैकड़ों चीज़ें नापसन्द हैं मुझे अपने देश की- ज़्यादातर सरकार से ताल्लुक़ रखती। मुझे मालूम है कि किसी देश की सरकार ही वह 'देश' नहीं होती, पर हर दम वही, 'देशी' लिबास ही पहनी मालूम होती है वह। यहीं का हूँ; यहीं जीना और मरना चाहता हूँ। घूमना-फिरना ज़रूर पसन्द है मुझे विदेशों में। आसान महसूस होती है वहाँ की ज़िन्दगी, खाना-पीना बेहतर ज़बान पर चढ़ता है, और औरतें भी वहाँ कि कम अकड़ दिखाती हैं- कम शब्दों में कहूँ तो मज़ेदार लगता है जीवन ज़्यादा वहाँ का। पर जल्द ही थक जाना शुरू हो जाता हूँ इस सभी से, और वापस अपने कूड़े के ढेर में आ लौटने का मन करता है, अपने मुँहफट, पसीज रहे, बदबू फैलाते देशवासियों के बीच। अफ़्रीका और इङ्ग्लैण्ड में बसे अपने भाई-बहनों-सा ही महसूस करता हूँ मैं भी। दिमाग़ कहता है अच्छा रहेगा अगर विलायत में ही कहीं बस जाऊँ, पेट कहता है सन्तुष्टी मिलेगी ज़्यादा, आनन्द मिलेगा ज़्यादा वहाँ, "फ़ॉरन" में रहने का अगर मौक़ा मिल जाए, पर दिल कहता है "चलो भारत वापस"। जब भी लौटता हूँ देश, और सान्ता क्रूज़ हवाई-अड्डे से निकलता हूँ, और गुज़रता हूँ उस "वस्त्रविहीन" "मल-त्यागती" पङ्गत के सामने से, पूछता हूँ अपने आप से: "क्या ऐसा भी कोई इंसान है दुनिया में आत्म-रहित, जिसने कभी नहीं कहा हो अपने आप से, कि यह मेरा देश है, मेरे खुद का देश?" साँस नहीं ली जाती, पर चिल्लाता हूँ ज़ोर से, "हाँ, यह है मेरा देश। मुझे पसन्द नहीं, पर प्यार है मुझे इससे!"

अन्तिम विश्लेषण इस सवाल का जब कभी करूँ, वैराग्य-भाव शायद जब चरम पर हो, हो सकता है उपरोक्त का कुछ भी महत्त्व समझ नहीं आए। हाँ, यह भी फिर ज़रूर हो सकता है कि तब तक इच्छा भी नही रहे और किसी भी चीज़ की, कहीं भी और की। अजीब बात यह होगी कि ऐसा विश्लेषण खुद सौ-टका हिन्दुस्तानी मालूम होगा शुरुआत से।
Why I continue to want to live in India
20th August
In a few days' time (I begin this on the 11th of August, 2020), we shall be celebrating our 'independence'. It'll have been 73 years since 1947, and about 5300 since Indus Valley. I read somewhere recently that India might very well be amongst the worst countries in the world to have to live in. And yet, for reasons I shall try to clarify, I appear to continue to want to do so.

I write what follows admitting a sufficient amount of luxury in my life, sufficient to be able, for instance, with rather some effort, to endure my situation as it at present, yet sufficient also, with somewhat some more effort, to escape it, should I like to. Indeed, many of my childhood acquaintances have in fact left. And indeed, I too did once leave, physically, with the intention of not coming back, and even more so philosophically — but returned.

I cannot say I like living in India still. I cannot lie. If not daily nowadays, at least once every week, I do despair of my country. I really cannot say anything good, in general, about the people here, with whom, hard as I try, I haven't at all been able to see eye to eye on anything. My friends from abroad do of course often enough visit, and I do indeed feel lightened somewhat thereby, but really it's rather disheartening to realise that I am living in a country where none of them will want to contemplate settling down in - more so, that I am living in a country where none of whom who already live where they do, seem to have done so out of their own free will - and who will not flee at once, if given the slightest of chance. To add serious insult to injury, there's hardly anything, really, as goes natural scenery, here, at least here in Delhi, to recommend, or feel compensated by.

Though I shan't of course swear eternal allegiance to my present beliefs - I have stressed upon momentary but universal consistency, but never demanded of myself, or of anyone else for that matter, anything at all like permanent or eternal consistency- and I should like, indeed, to keep at least one foot out the door, should circumstances so develop- I should like, nevertheless, to state them. And I should like to do so as succinctly as I can, as any such beliefs, in actuality- if considered in all their detail- tomes upon tomes can fill.

With the above convenience allowed for, I shan't talk of the future. With the law of the jungle having firmly been established, apparently, in 'modern' India, as its governing principle, I can only but imagine, on bad days, for it to be becoming a second-rate, or perhaps hundredth-rate, America in years to come. And I'm not quite sure I should like that very much.

If I talk of the past, my own past, when first, consciously, I decided 'to become an Indian' (which was when I was in the UK, I should add), my motives were largely these following: a certain heartbreak, financial difficulties, a growing desire to be hearing my own language about me, a repugnance against visa inequalities growing fiercer by the day, and a resurgence of a particular self-respect in myself, as a result, which allowed me no longer to admire riches I had known to have been looted from my very own people. I did not want to feel myself a hypocrite, in short, nor at all a renegade. I could do something about the condition of my own country, I felt; and, if knowing so, I chose not to, my life was expendable. The people there, indeed, were kinder to me, the air there purer and fresher, the countryside worth its name, but I'd have felt myself all the hollower for having stayed. I submerged myself instead in Gāndhī and Tagore; and my country, I felt, was redeemed. I started to feel a meaning to where I was born.

Since when, I have had to lose most of my illusions, sadly. The India of Gāndhī and Tagore, I found nowhere in actuality. 'Practically', or 'quantifiably', I have not been able to accomplish anything moreover, it would seem. I am yet largely dependent upon my contacts abroad for my finances; and my efforts regarding language and dress have also conclusively proved unsustainable. I haven't had much luck with my neighbours either. As a personal policy, I now only travel to countries which I've either been invited to, or feel, otherwise, welcome in, which aren't all that many, it turns out. The pollution continues to grow, as does the population. Life, I have had to discover, is cheap here - terrifyingly so. All in all, I have come to lose all faith in governments, whether of nations, or indeed of 'God'.

Whom I do still have faith in, in Tagore's words, are those 'individuals all over the world who think clearly, feel nobly, and act rightly', those 'channels of moral truth'. I don't still feel myself a hypocrite at least, nor a renegade; I've been able to keep intact that 'self-respect' of mine - I don't know how many people have. Perhaps this really ought to be sufficient for one to continue wanting to live in one's country, distressing as it may be; it doesn't of course feel sufficient often enough - on a midsummer afternoon, for instance, in a traffic jam, but there it always is, as a guiding principle. To be fair, of the future too, it seems, at least this one thing I can say, of the future perhaps beyond myself: that I do indeed harbour a faint, perhaps misguided, belief that even by my merely continuing to stay here in India, should even I not really be able to do anything about it, and despite how difficult it everyday seems, and given especially the knowledge of how else life can be lived, in Scandinavia for example- where were people to characterise their life in one word, they'd perhaps choose 'cosiness', where we on the other hand should have to confess 'makeshift'- I am in part, for now, somehow, fulfilling my role. And indeed, it isn't true that absolutely everyone wants to flee the country! There 'are' mahatmas treading our soil even today.

'Practically', again, of course, there have had to be other encouragements as well. The question of 'why I continue to want to live in India' has gradually melded together with that of 'how' I may continue to want to do so. If not thought about constantly, and if lived actually and clearly, life anywhere in fact is possible, is it not? I have had to harden my heart for certain, to begin with. I have had to compromise on my ideas of perfection. I have had to realise that neither can one, here, go on sympathising with another, nor 'antipathising', indefinitely. One cannot maintain an 'all or nothing' philosophy, also, as regards one's own identity; one must be willing to pick and choose, and be spontaneous, at every moment. Poetry has had to be foregone, sadly; there feels no room for it. Contrary to worldwide trend, I have had to learn, also, to care less about the present moment- or care only with the utmost calculation-, taking pride instead in the past much more readily, and looking forward, as strategically as can be managed, towards the future. In fact, the future, I now see, cannot at all be left out, can it? There are things I should like to have done, milestones I should like to have crossed, in life. And given the relative ease with which these can be done, those can be crossed, where I was born, my not having to claw, or trick, my way into somewhere else's citizenship, perhaps the decision boils down to whether one is willing enough to let go of that dim hope for the future, upon consultation with present convenience. Were I pressed still harder for an answer as to 'why', I should say that because at present I have my home here. A home of my own- which I may decorate as I will- and within which at least, I may live as I will- and one, for which, I need not pay rent. I'm afraid I'm not as 'entrepreneurial' or 'enterprising' to be able to afford anything similar anywhere else anytime soon. At the least, for now, my life within my home is entirely my own; I need not submit to regulations I do not recognise. Is it perhaps a desire for control? In the end, I suppose I don't wish to live as anyone's pet; I'd much rather a stray's life, thank you very much.


I've been meaning to compile a family history of mine for quite a while now. It occurred to me yesterday (the 19th of August), in connection with the above, that my own ancestors ought also perhaps to be labelled 'renegades' by the same token, for many a time having moved about- granted within the country itself, but nonetheless. The labelling would be incorrect however, wouldn't it? For there is emigration by necessity, and emigration by desire- out of a certain self-interestedness, I mean, for 'better prospects', to where one's 'talents might better be appreciated', for instance, or, vice versa, where the power of one's currency begin to feel manifold, on account of next to no effort of one's own. To my own knowledge, never has the latter taken place in my family. It is not of course a crime to be doing so, to be clear, should the movement resemble that as of perhaps from Italy to Spain, but I don't suppose convenience had as yet been made a Goddess before my time. My ancestors did indeed emigrate, every now and again, yet never wither they should have had to face embarrassment about doing so, never wither they should have had to face the indignity of having to 'apply' to be able to do so.

They're also a little bit like those in marriage, aren't they, these feelings of mine? Of course I haven't personal experience of the matter, but moving to another country, for now, does perhaps feel like adultery. And I'm unfortunately not even so short-tempered as to be able to consider a quick divorce.

The very same was asked once writer Khushwant Singh, I recently discovered- I ought certainly to read more of whom. '"Why am I an Indian?" I did not have any choice; I was born one. If the good Lord had consulted me on the subject I might have chosen a country more affluent, less crowded, less censorious in matters of food and drink, unconcerned with personal equations and free of religious bigotry. Am I proud of being an Indian? I can't really answer this one. I can scarcely take credit for the achievement of my forefathers. And I have little reason to be proud of what we are doing today. On balance, I would say, "No, I am not proud of being an Indian." "Why don't you get out and settle in some other country?" Once again, I have very little choice. All the countries I might like to live in have restricted quotas for immigrants; most of them are white and have prejudice against coloured people. In any case I feel more relaxed and at home in India. I dislike many things in my country- mostly the government. I know the government is never the same as the country, but it never stops trying to appear in that garb. This is where I belong, and this is where I intend to live and die. Of course, I like going abroad. Living is easier, wine and food are better, women are more forthcoming- it's more fun. However I soon get tired of all those things and want to get back to my dung-heap and be among my loud-mouthed, sweaty, smelly countrymen. I am like my kinsmen in Africa and England and elsewhere. My head tells me it's better to live abroad, my belly tells me it is more fulfilling to be in "phoren", but my heart tells me "get back to India". Each time I return home and drive through the stench of bare-bottomed defecators that line the road from Santa Cruz airport to the city, I ask myself: "Breathes there a man with soul so dead, who never to himself hath said, this is my own land, my native land?" I can scarcely breathe, but I yell, "Yeah, this is my native land. I don't like it, but I love it!"

In the final analysis, when the spirit of detachment I shall find strongest within me, perhaps none of the above will matter. Yet then also, perhaps, I shall have lost the desire for anything else, anywhere else. The funny thing is, that the analysis itself, I shall know, would have been patently Indian from the beginning.
जन गण मन
१५ अगस्त
जन-गण के मन के अधिनायक, भारत के भाग्य-विधाता, जय हो!
पञ्जाब, सिन्ध, गुजरात, महाराष्ट्र, द्रविड़
उत्कल, बङ्गाल
विन्ध्य, हिमाचल, यमुना-गङ्गा
की उछली समुद्री तरङ्गें −
सभी तेरा शुभ नाम सुन जाग उठते हैं, सब तेरा शुभ आशीर्वाद माँगते हैं,
तेरी विजय की गाथा गाते हैं।
जन-गण के मङ्गल-दायक, भारत के भाग्य-विधाता, जय हो!
विजय हो।।

निरन्तर तुझे पुकारा, सुनी तेरी उदार वाणी
हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी, मुसलमान, ईसाई,
पूरब-पश्चिम से आ, तेरे सिंहासन के पास
प्रेम-हार बन गुथे हैं।
जन-गण को एक करने वाले ऐ विधायक, भारत के भाग्य-विधाता, जय हो!
विजय हो।।

उत्थान-पतन में बँधा, पथ पर युग-युग दौड़ता रहा यात्री।
हे चिर-सारथी, दिन-रात तेरे ही रथ के पहियों से ध्वनित रहा यह पथ।
निर्दयी विपत्तियों के बीच तेरे ही शङ्ख की ध्वनि बजकर
दुख-सङ्कटों से रक्षा करती रही।
जन-गण के पथ-प्रदर्शक, भारत के भाग्य-विधाता, जय हो!
विजय हो।।

आधी रात को, घोर अँधेरे बादलों से बोझिल, पीड़ित, बेहोश पड़ा देश
जागा, तेरे बिना पलके झपकाए, झुके हुए नयनों के अचल मङ्गल के सहारे।
भयानक सपनों के आतङ्कों से रक्षा करती, किसी रूप में
स्नेहमय माता है तू।
जन-गण के दुखों ने निवारक, भारत के भाग्य-विधाता, जय हो!
विजय हो।।

रात प्रभात बन चुकी, सूर्य की छवि पूर्व में उदय-गिरि के माथे पर आ उठी है।
पञ्छी गा रहे हैं, पवित्र हवाएँ नए जीवन का रस उँड़ेल रही हैं।
तेरी करुणा का यह सुर्ख़ राग सुन, सोया भारत जाग रहा है,
चरणों में तेरे नत-मस्तक।
राजाओं के राजा, भारत के भाग्य-विधाता, जय हो!
विजय हो।।

सिन्ध: आज की तारीख़ में पाकिस्तान में, उत्कल: वर्तमान ओडिशा, द्रविड़: दक्षिण-भारत, विन्ध्य: विन्ध्याचल पर्वतमाला से जुड़ा भारत का भूतपूर्व प्रदेश, चिर-सारथी: बहुत समय से रथ चलानेवाला
वन्दे मातरम्
२६ जनवरी
वन्दना करता हूँ, ओ माता,
जल से परिपूर्ण, सुन्दर फलों से भरी,
चन्दन से उत्पन्न शीतलता से भरी,
नई घास-सी गहरी,
ओ माता।

श्वेत चाँदनी से पुलकित, ओ रात,
फूलों से खिले पेड़-पत्तों की शोभा,
सुन्दर तेरी हँसी, अत्यन्त कोमल तेरी भाषा,
सुखद वरदान देनेवाली, ओ माता।।

करोड़ों मधुर गले ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे हैं,
करोड़ों भुजाएँ मिली साथ घेरा बना रही हैं।
कौन बुलाता है तुझे 'अबला', ओ माँ?
अत्यन्त शक्तिशाली,
ओ तारनेवाली, नमन करता हूँ,
शत्रुओं के दलों पर वार करने वाली,
ओ माता।।

तू विद्या, तू धर्म,
तू हृदय, तू मर्म,
तू जी शरीर में प्राण,
बाँहों में तू ही, माँ, शक्ति,
ह्रदय में तू ही, माँ, भक्ति,
तेरी ही प्रतिमा हर मन्दिर में गड़ी।।

तू ही दुर्गा,
दस अस्त्रों की धारक,
लक्ष्मी, कमलों के दलों की विहारी,
वाणी है तू, विद्या की दायक,
नमन करता हूँ तेरा,
नमन करता हूँ, ओ कमलों वाली,
धन-सम्पत्ति अतुलनीय वाली,
जल से परिपूर्ण, सुन्दर फलों से भरी,
ओ माता।।

वन्दना करता हूँ, ओ माता,
गहराईओं से भरी, सरलता से भरी,
मन्द-मन्द हँसती, आभूषणों में सजी,
इस धरती को भरती,
ओ माता।।


शुक्रिया करें शब का अदा, हज़रात
२५ मार्च
यों गहरे ये ज़ख्म क्यों हमने भी पाए?
ता-उम्रों का मरहम भर नहीं पाए।

जाते हैं हम भी हर रोज़ मयख़ाने।
नशा क्या है क्यों समझ नहीं पाए?

क्यों हाफ़िज़ हैं इतने? इतने क्यों तङ्ग?
बाजे हैं बजें; हम नाच नहीं पाए।

किसने ना चाही नजात? है हर ने!
आँखें हैं सबकी; हम मीच नहीं पाए।

शुक्रिया करें शब का अदा, हज़रात −
हो सहर बिन जिस बरदाश्त नहीं पाए।


ता-उम्र: सारी उम्र, हाफ़िज़: धर्मशील व्यक्ति, हज़रात: सज्जन
My Days these Days
10th February
My days these days, they pass like lives.
I wake full drunk from rapturous rest.
I rove awhile, till sense arrives.
I strain my frame, and manhood test.
With oh what fiery hope I ply
Upon yon world to beauty find!
I fall in live — I swoon, and fly,
I freedom be - however blind -
For silence, soon, engulfs the soul,
Dejection, and, of darkness born.
I read and write. I play my role.
I fathom far yon depths forlorn -
To oft a magic midnight sigh
Of Memory hear. And tired die.
२८ जनवरी
खण्ड पहला

हैं तरफ़ हर दरिया-किनारे दिखते
राई और जौ के खेत ढकते
कोना-कोना ज़मीं का आसमाँ छूते;
इक रास्ता है जाता मैदान होते,
है ऊपर और नीचे रोज़ाना होता
ताकना जिस ओर गुल कँवल उगता
इस टापू के गिर्द - वह वहाँ सोता,
वह टापू, जज़ीरा-ए-शलॉट।

बेंत कुम्हलाते, सफ़ेदें कँपकँपाते,
मन्द-मन्द झोके, छिपते, ठिठुरते,
सैरते, लहरते, घुलते और मिलते,
टापू से होते, गुज़रते पहुँचते
मुसलसल हर-दम कैमिलॉट।
चहारदीवारी, चहारमीनारी
स्लेटी, से दिखती इक फुलवारी;
वीरानी से लिपटी, जज़ीरे पे रहती
वह, मोहतरमा-ए-शलॉट।

हाशिया-नशीं, परदा दरख़्तों का रखते,
वज़नी जहाज़, सरकते, खिसकते।
पीछे आहिस्ता-सेे घोड़ें हैं चलते।
इक कश्ती, झिलमिलाती, रेशम फहराते,
तैरती पहुँचती कैमिलॉट।
हैं देखे क्या किसने इशारत वे हाथ?
है देखी वह तख़्ती झरोखे के साथ?
या जानता हर कोई मोहतरमा की गाथ?
उसकी, मोहतरमा-ए-शलॉट।

लुनेरे ही दिखते, लुनते वह जौ;
हैं सुनते वही वे तरन्नुमें सौ,
वे दरिया से आते, फटती जो पौ,
मँडराते पहुँचते जो कैमिलॉट।
पहाड़ी हवाई पर पूले बनाता,
वह गूँजता तराना चाँदनी में सुनता,
इस थका लुनेरा यह फुसफुसाता:
'है परीज़ाद मोहतरमा-ए-शलॉट'।

खण्ड दूसरा

बुनती दिन-रात, वह बुनती है रहती
जादुई इक जाल, रङ्गीं, वसन्ती।
'पतझड़ है पास' - ख़बर इक उड़ती
है सुनी उसने जो - 'गर नज़र है मिलती,
दिख झलक भर जाता गर कैमिलॉट'।
पर कैसी 'पतझड़' वह, कैसा वह शाप,
जानती नहीं - सो रहती चुप-चाप −
जपती बेनाग़ा ज्यों जोगन है जाप-
बुनती मोहतरमा-ए-शलॉट।

आईने इक साफ़ में, सामने लटकते,
खूँटी पर हर दम, ज़रिए गुज़रते
दिखते दुनिया के सायें उभरते।
दिखता वह रास्ता रेंगते, पसरते,
जाता नीचे जो कैमिलॉट:
और दिखती वह दरिया, छलकती, छमछमाती,
दिखते वे उखड़े मज़दूर देहाती,
सुर्ख़ी दुपट्टे- बाज़ारों से करती
पार लड़कियाँ शलॉट।

यों कभी दोशीज़ाओं का खुशनुमा क़ाफ़िला,
कभी फ़क़ीर कोई गश्त पे निकला,
कभी चरवाहा - गड़ेरिया घुँघराला-,
या ज़ुल्फ़ी जवाँ कोई सूरज-सा उजला,
जाता मीनारदार कैमिलॉट।
और कभी उस नीले-से शीशे में दिखते
वे रुस्तम-बहादुर, घुड़सवारी फ़रमाते:
वफ़ादार, ईमानदार कोई वीर नहीं वास्ते
यों उसके, मोहतरमा-ए-शलॉट।

बहर हाल, कलौंसी पर बुनती शरारे,
बुनती वे आईने के जादुई नज़ारे,
जो अक्सर वे दिखते, महमाँ सितारे,
इक रोशन जनाज़ा, दरिया-किनारे,
जाता कव्वाल कैमिलॉट:
या चौदहवीं की चाँदनी जब फ़लक पर चढ़ती,
और आशिक़-माशूक़ा की जोड़ी निखरती,
'हूँ ऊब चुकी अब इन अक्सों से' कहती
मैं', मोहतरमा-ए-शलॉट।

खण्ड तीसरा

तीर-नुमा ख़ाबगाह की ओरियों को चीर,
खलियानों को चीर, सवार-ए-समीर,
छनती आतिश हो, चुन्धियाता इक हीर,
पीतल की बख़्तर में सूरमा, कबीर,
शूर मोहतरम लांसलॉट-
शुजाअत हो ढाल पर जिसकी पुर दर्ज़,
फ़रमाती खूबसूरती को आदाब अर्ज़,
चमचमाती मैदानों में सोने के तर्ज़,

लगाम नवरत्नी वह उड़ती आज़ाद,
सितारों की शाख़ हो, इतनी आबाद
खुद कहकशाँ मानो हो दे रही दाद।
वे घुँघरू झङ्कार मयकश इक नाद
जो सरपट वह दौड़ा कैमिलॉट:
था टँगा और परतले नक़्क़ाशी-लबरेज़
से चाँदी का बिगुल इक हैरत-अङ्गेज़,
और खनका बख़्तर वह, दौड़ा जो तेज़
हमसाया-ए-सुनसान शलॉट।

नीलम था अम्बर और मौसम फ़रहीन।
जवाहरों से जड़ी वह चमड़े की ज़ीन
चमकी, और टोपी और कलगी हसीन,
जो दौड़ा वह नीचे कैमिलॉट,
ज्यों अक्सर वह जामुनी रातों में दूर
आकाशगङ्गा में बहता सुरूर,
किसी टूटे हुए तारे का छूटा हुआ नूर
सहला जाता सूना शलॉट।

पी धूप ज्यों भौहें उठ खिली उसकी;
जङ्गावर घोड़े की नालें दमकी;
टोप तली बदलियाँ ज्यों झूमी-झुमकी,
वे काजल-सी काली ज्यों लटें लहकी,
जो दौड़ा नीचे वह कैमिलॉट।
झलका वह दरिया, और दरिया का सिरा,
आईने बिल्लौरी पर बिजलियाँ गिरा,
गाता इक गाना, 'टिरा-आ-लिरा',
झलका मोहतरम लांसलॉट।

फेंक उठी करघा वह, खा उठी ख़ार,
चक्कर लगाए कमरे में चार,
देखा वह कँवल-ए-आब गुलज़ार,
देखी वह टोपी और कलगी सवार,
देख लिया आख़िर वह कैमिलॉट।
जो हवा इक चली, और टूट गया जाल;
टूट गया शीशा वह; ठहर गया काल।
'लग चुका शाप, हाय अल्लाह!' बेहाल
चीखी मोहतरमा-ए-शलॉट।

खण्ड चौथा

तूफ़ानी पुरवैया यों रोती-रँभाती,
ज़र्द हर वादी यों आँखें चुराती,
नदिया किनारे से ज़ोर चिल्लाती,
फूटी हुई बदलियाँ बारिश बरसाती,
दफ़नाती मीनारदार कैमिलॉट।
नीचे वह उतरी जो कश्ती दिखलाई
दी, तैरते इक तने के तले समाई।
माथे पर कश्ती के आखर वे ढाई
दिए खुरच: 'मोहतरमा-ए-शलॉट'।

हो धुँधले उस दरिया के कारे उस वास
के सायों में खोया कोई अञ्जुम-शनास,
देख रहा अपनी बदक़िस्मती-ओ-यास,
काँच-नुमा दीदों से, ऐसा आभास
दे, देखा फिर ओर-ए-कैमिलॉट।
और ढीली ज़ञ्जीर, जो बीते वे पहर,
और बैठी जा नीचे। उठी इक लहर।
दूर गई बह- था पानी या ज़हर?
वह, मोहतरमा-ए-शलॉट।

लेटी, इक बर्फ़-सा चोगा पहनकर
ढीला ज्यों यहाँ, ज्यों वहाँ को सर-सर
उड़ता, और हल्के वे पात ज्यों झर-झर
गिरते, और शबनम हो मोती जो उस पर-
तैरती हुई पहुँची वह कैमिलॉट:
और जो-जो हुई कश्ती मँडराती अयाँ,
खेत-ओ-खलियान-ओ-पहाड़ी दरमियाँ,
गया वह सुना, वह आख़िरी बयाँ,

गया वह सुना, वह ज़ाहिद मज़मून,
गाए वे गए अलफ़ाज़ मरहून,
पुर जमा न जब तक आहिस्ता से खून,
और राख न हुआ जल-जलके जुनून
जिन आँखों में दिखता था कैमिलॉट।
जिससे पहले के ज्वार की डोली पर आती,
किनारे पर पहला मकान देख पाती,
गुज़र गई अपना वह गीत गुनगुनाती
वह, मोहतरमा-ए-शलॉट।

मीनार तले, छज्जे-ओ-रोशनदान
तले- गलियारों, दीवार-ए-बाग़बान
से होती-इक जगमग आकार, बेजान,
-दोनों तरफ़ थे ऊँचे मकान-
पहुँची ख़ामोश वह कैमिलॉट।
निकल-निकल आए वे घाटों पर आम
बशर, मोहतरम, और बेगम तमाम,
और पढ़ा वह माथे पर कश्ती के नाम
लिखा 'मोहतरमा-ए-शलॉट'।

यह, कौन है यह? यह क्या है हुआ?
आवाज़ों न हँसती हुई शमों को छुआ,
बुझा वह उजला हुआ महल हो धुआ,
और माँगने लगा डर मारे हर दुआ,
हर वीर-बहादुर-ए-कैमिलॉट।
पर लांसलॉट ने थोड़ा यों ग़ौर फ़रमाया;
'प्यारा है चेहरा, बोला, बल खाया;
'रहम करे अल्लाह जन्नत का साया
नवाज़े, मोहतरमा-ए-शलॉट'।
कँवल: कमल, जज़ीरा: टापू, बेंत: एक पेड़, कुम्हलाना: मुरझाना, मुसलसल: लगातार, चहार: चार, फुलवारी: फूलों का बाग़, हाशिया-नशीं: किनारों पर, इशारत: इशारे करते, लुनेरा: फ़सल काटनेवाले मज़दूर, तरन्नुम: गुनगुनाहट, पौ: भोर का प्रकाश, पूला: घास-फूस का बन्धा गट्ठर, परीज़ाद: परियों की सन्तान, बेनाग़ा: लगातार, दोशीज़ा: कुँवारी कन्या, कलौंसी: कालापन, जनाज़ा: ताबूत, ओरी: छप्पर की तरह छोर जहाँ से पानी गिरता हो, बख़्तर: कवच, शुजाअत: बहादुरी, तर्ज़: तरह, हमसाया: पड़ोसी, परतला: कन्धे से लटकाई जाने वाली चमड़े की पट्टी जिसमें तलवार लटकाई जाती है, फ़रहीन: खुशनुमा, ज़ीन: घोड़े की पीठ पर रखने की गद्दी, सुरूर: नशा, बदली: छाए हुए बादल, बिल्लौर: शीशे जैसा सफ़ेद पारदर्शक पत्थर, करघा: कपड़े बुनने का यन्त्र, पुरवैया: पूरब से आने वाली हवाएँ, ज़र्द: पीला, आखर: अक्षर, कारा: काला, अञ्जुम-शनास: ज्योतिष, यास: उम्मीद, ज़ाहिद: सन्यासी, मरहून: गिरवी रखी

'“राष्ट्रभाषा” की अहमियत पर एक निबन्ध; ज़रिए जिसके, विलोमतः, "हिन्दुस्तान" मुल्क़ की परिभाषा। के अलावा शामिल, महात्मा गान्धी और जॉन रस्किन के उपरोक्त पर विचार।'

पन्ने: ३७

(और कृतियाँ नहीं छापी जा रही इस किताब की फ़िलहाल। और जानकारी के लिए कृपया सम्पर्क करें।)

The Necessity of a National Language
'On the necessity of a national language, and by way of which, conversely, a definition of the nation of Hindustān. Included also, remarks upon the same by Mahātmā Gāndhī and John Ruskin. Originally entitled "Zabāṃ-e-Hindustān", this pamphlet, translated especially into English for the author's foreign friends.'

Pages: 36

(Further copies of the booklet are not being printed. Kindly get in touch for more information.)

19th December
Nov. 18th, Kraków
My lungs, they felt deprived of air. My heart I had misplaced.
They could not see a thing, these eyes. It was so quiet everywhere.
I thought of God and poetry yet. I thought them to be traitors.
'No more do trust, my broken self!', said I, 'Nevermore do care!'

Nov. 19th, Kraków
My hands did panic- ink blood became- my heart a desert cold.
I swore relentless manhood 'gain, and 'Death to love and fame!'
I saw no meaning yet, I saw no sense. I hid myself from joys-
From joys forbidden- indeed they were- smiling just the same.

Nov. 20th, Auschwitz
The chill did beat upon my face, upon my frostbitten mind,
As I imagined, and I became, a subject mere, a race.
How ought I to sing and dance, except in madness, tell?!-
How unsee what I have seen? The anatomy of grace.
As half a corpse and half-awake, upon my bed at night
I lay and felt the snow again, again the familiar ache:
It did not scream, it did not cry- but faded into vapour-
It came benumbed, despair of One- benumbed in a Millions' wake.

Nov. 21st, Kraków
I'd asked and asked full desperate 'why', to accept at last defeat.
For silence was all there was; there was but silence mere to try.
The trees were there, however bare. The stars steadfast were there.
'To strive, to seek, and not to yield'. Macht, indeed, Arbeit frei.
१५ दिसम्बर
किस ग़म का मारा, ऐ वीर-बहादुर, तू
यों ज़र्द अकेला है फिरता?
इक पञ्छी नहीं तालाब किनारे,
इक पञ्छी नहीं है गाता!

किस ग़म का मारा, ऐ वीर-बहादुर, तू-
इतना थका, इतना जीवन से हारा?
है भर चुकी गिलहरी गोदाम अपना, देख,
है कट चुकी फ़सल, खेत सारा।

हैं कुमुद दिखते भौहों में तेरी,
सरसते, कँपकँपाते, बुख़ार से गीले;
गालों पे दिखते ग़ायब-से गुलाब
भी तेज़ कुम्हलाते-

मोहतरमा मिली थी मैदानों में एक,
बेहद खूबसूरत, किसी हूर की औलाद;
बाल थे लम्बे, चाल हिरनियों जैसी,
आँखें जङ्गली, आज़ाद-

ताज पिरोया गुलरुख़ के लिए एक,
फूलों के कङ्गन, और इत्र-बेज़ बन्द:
वह देखती रही- आहें भरती रही-
मीठी-मीठी और मन्द-

अपने फ़लकसैर घोडे पर बैठाया उसको
और कुछ नहीं देखा बाक़ी दिन-भर और,
ज्यों तिरछी वह झुकती, ओर अप्सरा बन जाती,
फ़रमानी जन्नत पर ग़ौर।

जड़-बूटियाँ तलाशकर वह लाई,
और जङ्गली शहद, और शबनमी आब,
और बे-शक अनोखी ज़बाँ में किसी
बोली, 'है प्यार आपसे, जनाब'-

लेकर चली अपनी जादुई गुफ़ा में।
और खूब रोई वहाँ, कराहयी बार-बार।
वहीं ओढ़ी जङ्गली आँखें उसकी मैंने वे
चूमकर चुम्बन चार।

और वहीं सुनाई लोरियाँ वे उसने मुझको,
और वहीं लगा देखने- देखने मैं, हाय!-
वह आख़िरी सपना मैं देखने लगा,
जिस टीले कोई न जाए।

पीले शहंशाह दिखे, शहज़ादे भी,
और पीले सिपाही, मुर्दा हर-एक;
चिल्लाते 'हसीं आतङ्कवादिनी ने फाँसा
बेचारा तेरा दिल नेक'।

होंठ दिखे उनके, अँधेरों में गुम,
भूखे, भयानक, पागल, वे, हाय!-
जब जागा बर्फ़ीले इस टीले पर मैं
जिस टीले कोई न जाए।

और इस ही लिए यहाँ मैं भटक रहा,
यों ज़र्द, अकेला हूँ फिरता;
इक तिनका नहीं तालाब किनारे जबकि,
इस पञ्छी नहीं है गाता।

कुमुद: श्वेत कमल, फ़लकसैर: आसमानी
It is Time
12th November
It is time — the time has come!
'Tis time again to do or die.
Perhaps to do AND die, need if be.
Yet, let us! You and I!

It is time — the time has come!
To beat our daggers into ploughs.
Perhaps to furrow barrens ever.
Yet, let is, brothers, rouse!

It is time — the time has come!
To say full plain what we have seen.
Perhaps in turn merely shame to hear.
Yet, let us — recall what we have been!

Let us live! Let us really live!
Let us thank the stars for we shall die —
Die in battle, brave, a might valiant death,
Bound in honour, head ever held high.

Let us love! Let us really, really love!
Let us inflame the night beyond our rues!
And let us not stop! And let us not fear — the lucent throes!
For we cannot lose. We cannot lose.
२३ सितम्बर
सुन रहे हैं 'तनहाई', सज़ा-ए-'शौक़-ए-शहादत'।
सुनते रहेंगे रज़ा-ए-खुदा।
थे मालूम नहीं क़ानून-ए-मुल्क-ए-मुहब्बत,
था मालूम नहीं जुर्म, होना ज़रा जुदा।
समझ बैठे जिसे इनाम-ए-मशक़्क़त,
समझ बैठे जिस तबस्सुम को नजात,
वह हसरत-अफ़ज़ाई, वह बेरहम नज़ाकत,
वहशत बन भूली वह हर मुलाक़ात।
हम देख नहीं पाए बद्ध-शर्म-ओ-शराफ़त,
हम देख नहीं पाए, शबाब-शराब में फ़र्क़।
इतराते रहे, जाँ बेहिफ़ाज़त,
इत्तफ़ाक़न मेहरबानियों पर निसार,
बे-होश-ए-मुक़र्री, ग़ुलाम-ए-फ़राग़त।
बहारों में लिपटे ख़िज़ाँ-आसार...
कब हमसफ़र क़दम, किस रोज़-ए-क़यामत,
किस मोड़ गए बिछड़ सर-ए-राह?
क्या क़समें? क्या वादे? क्या फ़र्ज़? क्या इनायत?
'कौन हम? कौन आप?' ज्यों रस्म-ए-विदा।
बरबाद गुलिस्ताओं में दीद-आबादी की इबादत,
निखरी आशिक़ियाँ ता-हद-ए-नज़र...
थी, अञ्जुम-शनास, वे शाप, या सआदत?
थम गए ज्यों सितारे सिम्त-ए-सिफ़र।

दें क्या बयान-ए-दिल-नशीं हम? बखान-ए-हुस्न क्या करें?
हर फूल यहाँ उन्ही के बदन-सा महकता है।
दिन ढलता नहीं, ढल जहाँ जाता है;
मुद्दत से सोए नहीं − नूर उनका जगाए रखता है।
पोशीदा नहीं ज़ख्म-ए-जिगर हमारे। रखें कैसे आख़िर ना-अयाँ?
हिस्सा-हिस्सा रुसवा जिस्म का, गीला अब भी नक़्श-ए-लब से है।
रुखसत, हाँ, आफ़ताब नहीं, बेशक रोशन रुख़सार है −
रोती नहीं क्या शब मगर फिर? शबनम रोज़ उभर आती है।
पर उफ़! वे लम्हों में हज़ारो साल जो जी लिए!
खुदा की क़सम हज़ारों जाम जो पी लिए!
वे चादरों पे सुने फ़िरदौसों के राज़...
दोहरा वे नहीं सकेंगे, वे अनकहे अलफ़ाज़।
वह औलाद-ए-कुदरत खुद से वास्ता जो हुआ,
वह आग़ोश-ए-वक़्त-ओ-बख़्त अनन्त ज्यों हुआ,
इतनी हम-ख़याली! यक़ीन न हुै!
बे-लिबास, रू-ब-रू, रूह-ब-रूह हो गया।
रखें कैसे क़ाबू इन ख़यालों पर हेम?
इन ख़्वाबों पे भला इख़्तियार कैसे?
ख़ानाबदोश आँखें, देख आलम-पनाही,
हिजाब-ए-दरमियाँ सहें कैसे?
थी कैसी गिरफ़्त वह, आज़ादी से बेहतर?
शम कैसी फ़रोज़ाँ दुनिया जला गई?
वह जोगिन, हमारी हर हरकत से वाक़िफ़ −
हैं ज़िन्दा ज़रूर − ज़िन्दगी चुरा गई।

अब मर-मिट जाने का मन करता है, ऐ क़िस्मत-
हैं खूब आज़मा लिए फ़रेब तेरे।
मिल खूब चुका है सिला-ए-शिद्दत।
फ़रियाद नहीं और − नाचीज़ ठहरे।
लिखते रहे हम नज़्म-ए-इश्क़-ओ-नफ़ासत;
जवाबों में मिल क़त्लनामे ख़ामोश।
महरूमी से सीखी आख़िर हमने हक़ीक़त:
इक-तरफ़ी नायाबी। एहसान-फ़रामोश
पर हैं नहीं हम − बावजूद सलामत-
रहे हैं - रहेंगे -शुक्रगुज़ार।
थी वाक़ई नहीं हममें इस क़दर लियाक़त-
करने दिया फिर भी जिस क़दर प्यार।
हैं इंसाफ़-पसन्द शायर हम, यह महफ़िल अदालत;
है 'अफ़्सुर्दगी' हम पे इलज़ाम।
'खुदग़र्ज़ी' ग़मज़दगी, क़सूृर गर क़ुल्फ़त,
मंज़ूर है: वक़ालत हमारी ख़ाम!
ये नौसिखिए अलफ़ाज़, यह ख़ता खूबसूरत
कर रहे हैं मगर आप ही के नाम।
ज्यों सुनाई तआबीरें, ज्यों रिझाई रियासत
आपने- नज़रबन्द रहें उम्र तमाम।
मलिका-ए-ज़मीं, हयात-आफ़रीं हमारी,
खुद भी 'फ़लक-ज़ादे 'अर्जुन' हैं हम।
वक़्त आने दें − तूफ़ाँ पनप रहा है।
ज़ाहिद नहीं बस, क़ातिल-ए-आज़म भी हैं हम।

तबस्सुम: मन्द मुस्कान, हसरत-अफ़ज़ाई: कामना का उत्थान, वहशत: पागलपन, बद्ध: बन्धित, शबाब: जवानी, निसार: क़ुर्बान, मुक़र्री: नियुक्ति, फ़राग़त: बेफ़िक्री, ख़िज़ाँ: पतझड़, इनायत: कृपा, दीद: नज़ारा, इबादत: उपासना, सआदत: सौभाग्य, सिम्त: दिशा, सिफ़र: शून्य, दिल-नशीं: दिल में बैठा, पोशीदा: छिपा, ना-अयाँ: अदृश्य, रुसवा: बदनाम, रुखसत: विदा होने का भाव, आफ़ताब: सूरज, रुख़सार: गाल, शब: रात, फ़िरदौस: स्वर्ग, आग़ोश: आलिङ्गन, बख़्त: क़िस्मत, रू-ब-रू: आमने-सामने, रूह: आत्मा, इख़्तियार: अधिकार, ख़ानाबदोश: जिसका ठौर-ठिकाना न हो, आलमपनाह: बादशाह, फ़रोज़ाँ: मोमबत्ती का गुल, सिला: पुरस्कार, शिद्दत: कठिनाई, फ़रियाद: शिक़ायत, नज़्म: कविता, नफ़ासत: नफ़ीस/कोमल होने का भाव, महरूमी: वञ्चित होने का भाव, लियाक़त: लायक़ होने का भाव, अफ़्सुर्दगी: उदासीनता, ग़मज़दगी: दुखी, क़ुल्फ़त: तक़लीफ़, ख़ाम: कच्चा, तआबीर: स्वप्न का अर्थ/फल, हयात: जीवन, आफ़रीन: धन्य हो, फ़लक: आकाश, ज़ाहिद: भगवान् में लीन सन्यासी, आज़म: सर्वश्रेष्ठ
When upon what could have been I think again
12th August
When upon what could have been I think again,
Were I not who I was, and am as yet,
A happy heart had I, a happier brain,
Had but I learnt to lie, than truth regret;
When beneath the setting sun I stand alone,
And see my shadow, looming, fade away,
And hear the darkling sky, in tender tone,
Recounting dawns - no more today;
When about me still I feel a phantom breath,
A phantom touch arousing hope forlorn
Enough for one to swear a soldier's death
Were who to fight a losing battle born;
Out swells of Silence oft a whispering strain:
'Another'd have perished. You remain.'
To Sylwia
15th March
As there again upon that fairied grass I lie,
Midst isles of sun 'pon ruby oceans sewn,
Of which a drop your cheek caressed, dream I
A Sylvan dream, not quite alone.
Not quite alone my barge I sail ashore,
Full languid, yes - I am, alas, in thrall;
For I behold upon the verdure, sore,
What all despite ennobles all.

May I upon our Silence this once intrude?
May once this mist of mine of words bedew
Your memory's tender bud? I often brood
O'er faded flowers. What bloom anew
Your coming cast upon my parched days!
What vernal splendours dousing withering strife!
What brilliant visions rending habit's haze!
In moments granting all of life.
मधुशाला से प्रेरित कुछ पङ्क्तियाँ
२६ फ़रवरी
उन्मत लिखित कल रात रुबाई:

आज पढ़ी पहली कविता,
दफ़ा पहली चखी हाला
खिंची रेशों काग़ज़ के से। ऐ,
मातृभाषी साक़ी-बाला,
यों तो हर मद से परिचित
थे अधरे मेरे, फ़िलहाल मरीज़,
बन फ़रिश्ता जो तू चल आई,
शुक्रगुज़ार हूँ तेरा, 'मधुशाला'।

उत्पन्न सुबह अगली चौपाई:

बहुतेरे राज़ों से वाक़िफ़,
था नक़्क़ाश रहा प्याला,
लिए खड़ी जब देखी लथपथ
साक़ी वह भगवत् हाला।
देख सुराही जागी तृष्णा
फिर इन मतवाले क़दमों की;
कर पीछा पद-ललित चिह्नों का
मुद्दत में लौटा मधुशाला।

उन्मत: नशे में, रुबाई: चार पङ्क्तियों की एक कविता, हाला: शराब, साक़ी: शराब पिलानेवाला व्यक्ति, मद: नशा, अधर: होंठ, भगवत्: पूज्य

The Moral Question
'An essay, advancing a greater need of poetical consistency in one’s philosophy; in particular, by way of attempting to arrive at solutions to the problems of old age and domestic felicity, a clarification of one’s relations to, or the scope of one’s duties towards, those presently most pressingly resembling aspects of one’s world, namely one’s family and one’s nation.’

Pages: 111

(Further copies of the book are not being printed. Kindly get in touch for more information.)
'There are butterflies growing on a tree in the garden,
Red elephants tumbling down another;
There are suns in bunches gathered, hearts aloft in pardon;
Why must I then harden? Springs to autumn tether?'
Birthday Sonnet
9th November
Between two birthdays was what follows writ:

Six and twenty years old have I today grown.
What yet of myself to this world have I shown?
Been not to its songs and its strains a stone?
A-loitering forever, perfections to groan?
Have not I failed to live, have not I lost
Illusions all — therewith the skill to mirth
Where but to think upon one's tempest-tossed
Days and nights akin, be to my rue my birth?
Yet when I feel the pain to take, not strike a blow,
Not commit, suffer crimes my nation girth
-Many have fled; yet more will flee, I know-
May I endure, I wish, may unrest be sweet,
May a smile I find with which Truth to greet.

Prudence and Jurisprudence
‘A work in verse and prose, consisting principally of the poem, Farewell Britannia, on an instance of seemingly insurmountable inequality, with questionable origins, from the point of view of to whom is it subjected; in particular, the consideration of the issue of deprivation of freedom of movement, or visa restrictions, with an aim of arriving at an individual position on the matter, and an appropriate response in light of it.’

Pages: 135

(Further copies of the book are not being printed. Kindly get in touch for more information.)
'My shrinking self in mist I did see but how,
Sitting godly atop the rainbowed crest, a man;
Was falling I, or rising grander e'er to bow?
Till I knew not where I ended and the world began.'